हिंदी अनुवाद (कविता) :
अब जल्दी करो, हाथों को चलते रहने दो,
थ्रेशर ज़ोर से चल रही है, खाली घूमती भी शोर मचाती है।
आराम बाद में होगा, छाया भी बाद में मिलेगी,
पानी तभी मिलेगा जब काम पूरा हो जाएगा।
फसल के भीतर अनाज छिपा हुआ है,
अब दाने को भूसे से अलग करो।
मशीन को तेज़ और स्थिर गति से चलाते रहो,
घूमता हुआ चक्र बिना रुके चलता रहे।
घंटों का खर्च हर पल को गिन रहा है,
खाली चक्कर भी पैसे खा जाते हैं।
जाम हो या ठहराव—कोई फर्क नहीं पड़ता,
चलता हुआ समय अपनी कीमत मांगता है।
जब नपी-तुली घड़ियाँ यूँ ही फिसल रही हैं,
तो अब पेड़ों की छाया में बैठकर आराम क्यों?
अब जल्दी करो, मिल-जुलकर काम करो—
आज की रफ्तार ही हमारा मुनाफ़ा है।
— राजेंद्र प्रसाद मीना
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem