जब महानगर नींद के आगोश में चला जाता है,
स्मृतियाँ सजीव हो उठती हैं।
जिन्हें मैं दिन के बहानों में टाल देता था,
वे अँधेरे के साम्राज्य में फिर लौट आती हैं।
तकिए पर टिका हुआ सिर
एक अनिच्छुक साक्षी में बदल जाता है—
अधूरे रह गए वाक्यों का,
कभी न कहे जा सके स्वीकारों का।
बुझी हुई स्क्रीन के राख-से शीशे में
तुम्हारा नाम चमक उठता है—
न कोई पुकार शेष रहती है, न कोई संदेश,
फिर भी हृदय स्वयं उत्तर दे देता है।
खिड़की से ठंडी हवा भीतर प्रवेश करती है,
पुरानी हो चली साँसों को छूती हुई;
टूटी हुई हँसी, दबे हुए विलाप
रात की गाढ़ी निस्तब्धता में घुल जाते हैं।
रात कोई प्रश्न नहीं करती;
वह केवल स्मृति को पुनः स्थापित करती है—
कौन कभी आत्मीय था,
और कौन-से सत्य सदा अधूरे रह गए।
भोर में विस्मृति एक अनुष्ठान बन जाएगी,
फिर भी सत्य बना रहता है—
रात की स्मृतियाँ
एक ऐसी सच्चाई रखती हैं
जिसे दिन का प्रकाश भी सँभाल नहीं पाता।