जो हाथ में आया अपना है,
छोड़ो उसको जो छूट रहा।
अपना कौन यहाँ है तेरा?
गैरों से भरा ये पिंजड़ा है।
क्या अपना साथ निभाएगा?
अपनों की क्या परिभाषा है?
जीकर तुम देखो अपनों संग,
अपनों का पता चल जाएगा।
मात-पिता जो तेरे अपने हैं,
वो भी सिर्फ तेरे ही अपने हैं।
जो छूट रहा उसे छूटने दो,
उसे गैरों से बातें करने दो।
भरी उम्र पड़ी है तेरे जीने की,
मस्तक पर तिलक लगाने की।
छोड़ो अपनों की तकरारों को,
राह अपनी तुम आसान करो।
जीवन को जीत बनाओ ना,
हँस के कुछ भूल जाओ ना।
क्या जीत ही केवल जीत है?
कभी हार के जीत जाओ ना।
तकरारों की राहों में,
किसने अपना मकान किया?
जीने दो जो जैसे जीते हैं,
कहो— मैंने सब कुछ भुला दिया।
नशा मुक्ति का तुम केंद्र नहीं,
बातों से कोई तुझे सेंध नहीं।
महक निराली, दुनिया पागल;
गैरों से बातें? कोई बात नहीं।
© रजनीश राजन ✍️
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