क्या इश्क़ था,
जिसका ज़िक्र आम था मुआशरे में।
ख़ूब निभाया प्यार को हमने,
कि दास्ताँ जवान हो गई।
प्यार परवान चढ़ा,
उम्मीद-ए-वफ़ा काफ़ी थी।
दास्ताँ मुकम्मल हुई,
मगर कसक अधूरी थी।
वो कसक, मशक और वो यादें,
सब अधूरी थीं।
हुस्न-ए-आज़ाद थी वो,
शिकवा तो लाज़मी था।
ग़ुमशुदा हो गई वो,
ग़ुमसुम से उस प्यार से।
मैं दर-ब-दर फिरता रहा,
ज़िंदगी जहन्नुम हो गई।
मैं समझ न पाया था,
उसकी उस तबीयत को।
बरहम-मिज़ाज हो गई थी वो,
मेरी सादगी से।
हर बात पे बरहमी,
और उसकी वो बेरुखी तबीयत।
ग़ज़ब की वहशत थी,
कि मैं उसे भी प्यार समझ बैठा।
लाख क़सीदे पढ़े,
हज़ारों मिन्नतें की,
वो बेगाना हुई,
तो मेरी कैफ़ियत का क्या।
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