ताप तपन, मन बन उपवन;
हे गिरी गिरिधर, सुन सुवन।
गण मगन, मन आत्म रमन;
गल प्रेम की, जब हुई छुवन॥
सुमन अमन, तन करूं नमन;
रण चमन कर, उड़ा वो तपन।
कर करुण से, मुझे कर मगन;
है सपन गिरी, तेरो मेरो नयन॥
कीर्तन गुंजन, कर नूतन मंथन;
तोर नयन अंजन, करी दरसन।
लोचन तृप्त, शयन मैं अनिमिष;
करूँ कंचन तर्पण, पावन वंदन॥
कानन कंचन, गगन सुशोभित;
तोर चर रज, मोर भाल संजना।
मन कीर्तन गुंजन, प्रेम आकुल;
कर निर्जन मन, श्री तेरो शरण॥
तेरो पैर धूली, मन मेरो चंदन;
पावन पवन उवन, करी वंदन।
मैं छोटा तुच्छ प्राणी, हूँ शरण;
तेरो चरण में प्रभु, मेरो अर्पण॥
हे गिरी गिरिधर, सुन सुवन;
मन तन कीर्तन से, है नमन।
पूर्ण समर्पण, जीवन तर्पण;
श्री राधा, तेरो चरणन नमन॥
राधा किशोरी, तू ही गिरिधारी;
मेरो तेरो शरण, कृष्ण मिलाई।
श्री राधा रमण, मनमोर हर्षाई;
मेरो जीवन अब, तृप्त कहलाई॥
जो नाम कीर्तन, गुंजन श्री राधा;
कृष्ण, कृष्ण, मन तन हरि राखा।
ब्रह्म ज्ञान के स्रोत ही, श्री राधा;
मन रटे नाम, जो 'श्री राधा राधा'॥
करूँ श्री राधा नाम, मैं क्या बड़ाई?
हर अक्षर मुरारी, श्री कृष्ण समाई।
श्री राधा श्री राधा नाम जपूं जब;
तन मन हर्षाए, श्री कृष्ण मिले तब॥
हे गिरी गिरिधर, भक्ति ना जानूं;
श्री किशोरी जी से, तुझे मैं जानूं।
हे प्रेमानंद, मैं मूढ़ तुम्हारे चरणा;
कृष्ण किशोरी के मंत्र, जो दीन्हा॥
© रजनीश राजन ✍️
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