।। तेरी काली जुल्फें ।। Poem by Rajnish Rajan

।। तेरी काली जुल्फें ।।

तेरी काली जुल्फें
जुल्फ नहीं,
एहसासों का वो साज़ हैं,
तेरी रंग-बिरंगी
बिखरी जुल्फें
एक बहका सा एहसास है।

तेरी जुल्फें घटा,
बरसात भी पागल,
सपने बड़े सुनहरे हैं,
रंग-बिरंगी चिमटी तेरी,
आज तारे फिर क्यों फीके हैं।

तेरी काली जुल्फें...
एहसासों का वो साज़ हैं...

ओ मेरी हसीं, मुस्कान तेरी
तू मुझसे ही क्यों राज़ कहे
तेरे होठों से बहती नज़ाकत
मुझको वो तेरा मीत करे।

तेरे गालों पे वो काली घटाएं
वो मस्त नूरानी राज करें
तेरी हंसी भी उसपे खूब जंचे
जैसे सोने पे श्रृंगार करें

तेरी काली जुल्फें...
एक बहका सा एहसास है।

जुल्फें तेरी काले बादल
धूप में मुझको छाँव करें
जब प्यार से मुझको राज़ कहे
तेरी धड़कन मुझको साज़ लगे।

तुम जब अपनी जुल्फें संवारो
जुल्फों से एक झंकार बजे
मैं मीत तेरा एक गीत कहूँ
तुम उसपे अपना प्रीत जड़े।

तेरी काली जुल्फें
जुल्फ नहीं,
एहसासों का वो साज़ हैं,
तेरी रंग-बिरंगी
बिखरी जुल्फें
एक बहका सा एहसास है।
© रजनीश राजन ✍️

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