नारी पर मैं क्या लिखूं?
जब उसको मैंने पढ़ा नहीं।
बड़ाई में मैं क्या लिखूं?
लिखूं छलावे का सम्मान!
नारी को बस सुना है मैंने,
वो त्याग की मूरत होती है।
उस मूरत पर मैं क्या कैसे लिखूं,
जब उस मूरत को मैंने पढ़ा नहीं।
क्या जो त्याग समर्पित करती है,
वो ही आदर्श नारी कहलाती है?
उसके अस्तित्व को पढ़ना चाहता हूं,
मैं उस नारी को पढ़ना चाहता हूं।
सुना है
नारी मौन ही अच्छी लगती है,
वो मौन में देवी सी भी दिखती है।
मैं उस मौन को सुनना चाहता हूं,
मैं उस नारी को पढ़ना चाहता हूं।
सुना है
नारी पैरों की जूती होती है,
क्यों? वो समाज की खामी है!
मैं उस जूती पर क्या कैसे लिखूं?
जब उस नारी को मैंने पढ़ा नहीं।
सुना है
नारी शक्ति-स्वरूपा होती है,
वो पूजा में भी पूजी जाती है।
फिर नारी क्यों तड़पाई जाती है?
मैं उस तड़प को पढ़ना चाहता हूं।
नारी की प्रशंसा लिखूं
या लिखूं उसकी समानता?
छलावे का सम्मान लिखूं
या लिखूं उसकी सहजता?
मैं नारी पर लिखना चाहता हूं,
लिखूं छलावे का सम्मान?
मैं नारी को पढ़ना चाहता हूं,
उस शक्ति को गढ़ना चाहता हूं।
© रजनीश राजन ✍️
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