चाहत और चांद Poem by Rajnish Rajan

चाहत और चांद

ये तारे, सितारे और ये चाँद,
ये सब तुम्हें उदास दिखेंगे।
देखो अपनी 'चाँद' को, इस बिखरी चाँदनी में,
ख़ुदा कसम वो सदाबहार लगेंगे।

ये पल ठहर जाए बस,
इसी चाँदनी के साये में।
तुम्हारी चाहत चहक उठेगी,
इस रात की तन्हाई में।

इस चाँदनी में अगर,
'वो चाँद' तुम्हारा हो जाए।
ये तारे-सितारे अपनी चमक खोकर,
उदास नज़र आएँगे।

अपनी इस चाहत और चाँदनी को,
छुपा लो अपनी हुक़ू मत में,
वर्ना ये तारे, सितारे और 'ये चाँद',
सूरज को बुलाने की साज़िश करेंगे।

सूरज की तपिश भी क्या बिगाड़ेगी
इन हसीन 'संगम' का,
ये वफ़ा के साये तो,
'जलते सूरज' को भी सुकून की सौगात देंगे।

ऐ 'राजन',
अब किसी और रहनुमा की तलब क्यों?
जब थाम कर वो हाथ तुम्हारा,
तुम्हें एक नई कायनात देंगे।

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