ताप तपन सब मिट गया, मन बन गया उपवन।
हे गिरि गिरिधर सुन सुवन, अर्पण है यह तन ॥
मगन हुआ मन आत्म में, गल प्रेम की छुवन।
सुमन अमन तन अर्पूँ, करूँ प्रथम वंदन ॥
नूतन मंथन मन करे, अंजन नयन लगाय।
तृप्त लोचन शयन अब, अनिमिष दरस पाय ॥
कानन कंचन गगन सम, भाल सजे यह धूल।
चरण रज को पाकर, मन के खिले हैं फूल ॥
धूलि तुम्हारी चंदन, पावन पवन समान।
तुच्छ प्राणी हूँ शरण, करूँ चरण संधान ॥
तन मन कीर्तन में रमे, करूँ सदा ही नमन।
पूर्ण समर्पण प्राण का, राधा चरणन तर्पण ॥
किशोरी तू ही गिरिधारी, कृष्ण मिलाई मोय।
श्री राधा रमण मन बसे, जीवन तृप्त होय ॥
ब्रह्म ज्ञान की स्रोत है, श्री राधा का नाम।
राधा राधा रटत ही, मिले कृष्ण सुख धाम ॥
राधा नाम की महिमा, कैसे कहूँ बखान।
हर अक्षर में समाये, मुरलीधर भगवान ॥
भक्ति न जानूँ लाड़ली, शरण तुम्हारी आय।
प्रेमानंद जी की कृपा, मैं मूढ़ मंत्र कमाय ॥
— © रजनीश राजन ✍️
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