एक सुकून की नींद चाहता हूँ। Poem by Rajnish Rajan

एक सुकून की नींद चाहता हूँ।

ग़ज़ब है, मुझे नींद में जगाती है।
मैं एक सुकून की नींद चाहता हूँ।

सितम है, सब मशरूफ़ हैं तमाशा देखने में;
अब.. मैं भी यहाँ ख़ुद का तमाशा बनाता हूँ।

बेचैनी, धड़कनें रोक बैठा हूँ मैं;
साँसें चल रही हैं, हार बैठा हूँ मैं।

ग़ज़ब की आँधी है तुम्हारी शिकायत में,
जिसने मुझे मर-मर के जीना सिखा दिया।

नज़्म बयाँ करूँ अपनी, ये सकत नहीं मुझमें;
अब करो मेरी शिकायत, यहाँ मलबों में बैठा हूँ।

कहाँ से लाऊँ लफ़्ज़, मेरी रूह तक नीलाम है;
आज़मा लो शिकायत, आख़िरी फ़ुर्सत में बैठा हूँ।

रूबरू मैं तेरे इश्क़ में, रुसवाई हर शाम हुई;
गिला करूँ किससे? ज़िंदगी यूँ नरक हो गई।

डगर बहुत लंबी है, साथ ख़ुद अकेले का है;
अच्छा है, ये सारे इल्ज़ाम मेरे लिए काफ़ी हैं।

कोशिश हार की है मेरी, मैं तो हार जाऊँगा;
जीतना तुम्हें है ना? पासा छोड़ जाऊँगा।

फ़रेब तेरी नज़र और आँखों में इश्क़,
मत कुरेद घाव को, ज़ख़्म भरने दे।

एहसास बाकी है, मैं यहाँ उसे बोल दूँ क्या?
चलो छोड़ो, अब वो वक्त का ज़ख़्म भरने दे।

शाम परोसी है तुमने, जज़्बात बेकाबू हैं मेरे;
भूल कैसे जाऊँ तुम्हें? ज़हर की उम्मीद रखता हूँ।

ऐ हुस्न-ए-मोहब्बत, तुम्हारी क्या बिसात!
तेरी ख़्वाहिश थी मुझे, बस ग़ज़ल बनने दे।

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