।। अंतिम सत्य ।। Poem by Rajnish Rajan

।। अंतिम सत्य ।।

मैं ठहरा श्मशान घाट किनारे,
जल रही चिताएँ नदी किनारे।
बह रही कल-कल करती धारा,
अंतिम सत्य का अद्भुत नज़ारा।

मरकर आते हैं लोग यहाँ,
जलते हैं वो बेखौफ यहाँ।
स्वजन दिखाते प्रेम यहाँ,
सत्य की सुंदर खोज यहाँ।

अपनों से छूटकर इस संसार में,
मिलते आकर अंतिम बार यहाँ।
धूँ-धूँ कर जलती चिताएँ,
मृत्यु ही—शाश्वत सत्य यहाँ।

जलती चिता से मैंने पूछा,
'इस माया में क्या हस्ती थी तेरी? '
बेखौफ अंदाज़ था कभी उसका,
अब बंद साँस में मौन बेचारा।

हर बात पे पर्चे छपते थे,
जवानी में जिसके चर्चे थे।
जल रहा अब बेखौफ यहाँ,
अंतिम सत्य—श्मशान यहाँ।

यहाँ अपने ही लकड़ी ढोते हैं,
कोई उस मुर्दे की नहीं सुनते हैं।
जलाने की रार में अपने ही,
यहाँ चंदन की लकड़ी ढूँढ लाते हैं।

लोग शांति और सच्चाई से,
यहाँ चैन की नींद सोते हैं।
गहरी नींद में सोये लोगों को,
अपने ही यहाँ जलाते हैं।

हस्ती धरी की धरी रह जाती है,
दौलत-शोहरत पानी में गोते खाती है।
संसार में बस एक ही सत्य है,
राम नाम सत्य है! मृत्यु ही सत्य है!
© रजनीश राजन ✍️

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success