'मस्तूर! तेरे नूर का इक़बाल है, महफ़ूज़ रहना;
ऐ मेरी ग़ज़ल-चश्म, तू चश्म-ए-बद-दूर रहना।'
'तू साहिर और तेरा अफ़्सूँ, सुन हुस्न-ए-बेपरवाह;
तग़ाफ़ुल न कर, तेरी शिद्दत से मेरा इज़तिराब है।'
'आफ़रीन! ऐ माह-जबीं, माहरू क़ुर्बत-ए-इश्क़ कर;
मसरूर हूँ मैं तेरे इश्क़ में, मुझे मोहब्बत का हक़ दे।'
'ऐ नाज़ुक-अंदाम-ओ-गुल-बदन, ताख़ीर न कर;
इबादत-ए-फ़रयाल करता हूँ, तू इजाज़त तो दे।'
'मुकम्मल इश्क़ में कर, ज़िंदगी वक़्फ़ कर दूँगा;
ग़ज़ल बेनाम ही सही, ग़ज़ल तेरे नज़्र कर दूँगा।'
© रजनीश राजन ✍️
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