कहीं मिलेंगे तो… Poem by Pushp Sirohi

कहीं मिलेंगे तो…

कहीं मिलेंगे तो…

कहीं मिलेंगे तो
सबसे पहले
तुझे देखने का नाटक नहीं करूँगा,
बस ऐसे खड़ा रहूँगा
जैसे तू
अचानक
मेरी आदत बन गई हो।

कहीं मिलेंगे तो
तेरी शिकायतें नहीं सुनूँगा,
पहले तेरी मुस्कान चुराऊँगा—
क्योंकि कुछ बातें
हँसी के बाद
ज़्यादा सच्ची लगती हैं।

कहीं मिलेंगे तो
तुझसे पूछूँगा नहीं
कि कैसी हो,
मैं खुद देख लूँगा—
तेरी आँखों में
थकान है या
मुझे देखने की
शरारत।

कहीं मिलेंगे तो
तेरी चाल पर
जानबूझकर
ध्यान नहीं दूँगा,
और तू
बार-बार
मेरे सामने से गुज़रेगी,
बस यह देखने के लिए
कि मैं कब पिघलता हूँ।

कहीं मिलेंगे तो
मैं तुझे छेड़ूँगा नहीं,
बस ऐसी बात कह दूँगा
जिसका मतलब
तू बाद में समझे,
और फिर
मुझे ढूँढे
अपनी ही मुस्कान में।

कहीं मिलेंगे तो
तेरी कलाई तक
रुक जाऊँगा,
और तू
मेरे रुकने को
मेरी हिम्मत समझेगी—
जबकि सच यह होगा
कि मुझे
तेरे एक क़दम
और आगे बढ़ने का
इंतज़ार होगा।

कहीं मिलेंगे तो
मैं तुझे
सबके बीच
ख़ास नहीं बनाऊँगा,
मैं तुझे
अपने पास
सामान्य बनाऊँगा—
क्योंकि असली मोहब्बत
भीड़ में नहीं,
आराम में पहचानी जाती है।

कहीं मिलेंगे तो
मैं वादे नहीं करूँगा,
बस इतना कह दूँगा—
"अगर थक जाओ,
तो यहीं बैठ जाना।"
और तू समझ जाएगी
कि यह जगह
सिर्फ़ बैठने की नहीं,
रहने की है।

कहीं मिलेंगे तो
हम जल्दी नहीं करेंगे,
क्योंकि शरारत
हमेशा
धीरे पकती है।

और जब हम अलग होंगे,
तो तू पीछे मुड़कर देखेगी—
और मैं
जानबूझकर
नहीं देखूँगा,
ताकि तू
मेरे इंतज़ार को
खुद महसूस कर सके।

कहीं मिलेंगे तो…
बहुत कुछ नहीं होगा,
बस
मोहब्बत
थोड़ी और
गहरी हो जाएगी।

— पुष्प सिरोही ❤️

कहीं मिलेंगे तो…
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