मेरे दोस्तों,
ये बात
लोहे की तरह सच है—
जो मन कहता है
"मैं कर सकता हूँ, "
उसके कदम
खुद ही रास्ता बना लेते हैं।
और जो मन कहता है
"मैं नहीं कर पाऊँगा, "
उसके सपने
चलने से पहले ही
थक जाते हैं।
अगर तुम सोचते हो
कि तुम हार जाओगे—
तो समझ लो
तुम पहले ही हार चुके।
अगर तुम सोचते हो
कि तुम जीतोगे—
तो जीत
तुम्हारे भीतर
पहले ही जन्म ले चुकी।
क्योंकि
किस्मत की शुरुआत
आसमान से नहीं होती—
सोच से होती है।
सफलता
कद नहीं देखती,
नाम नहीं देखती,
दुनिया की तारीफ़ नहीं देखती—
वो देखती है
तुम्हारा भरोसा,
तुम्हारी जिद,
और तुम्हारी तैयारी।
बहुत लोग कहते हैं—
"मैं चाहता हूँ…"
पर चाहना
काफी नहीं होता।
चाहने के पीछे
खड़ा होना पड़ता है।
गिरना पड़ता है।
उठना पड़ता है।
फिर चलना पड़ता है।
मेरे दोस्तों,
जीत
सबसे पहले
तुम्हारे दिमाग में होती है।
वहीं
वो योजना बनती है,
वहीं
वो ताक़त जागती है,
वहीं
वो आग पैदा होती है
जो कहती है—
"मैं रुकूँगा नहीं।"
कभी तुम कमजोर पड़ोगे,
कभी दिल डरेगा,
कभी लोग हँसेंगे—
और कभी
तुम खुद भी
खुद पर शक कर बैठोगे।
पर उसी वक्त
अपने अंदर
एक आवाज़ जगाना—
"अगर मैं ठान लूँ,
तो मैं कर सकता हूँ।"
क्योंकि
जिन्हें खुद पर भरोसा होता है,
उन्हें हालात
डराते नहीं—
वे हालात को
नया अर्थ दे देते हैं।
अगर जीत
बहुत बड़ी लग रही हो,
तो उसे
एक साथ मत उठाओ—
बस
पहला कदम उठाओ।
और फिर दूसरा।
और फिर तीसरा।
और देखना…
रास्ता
तुम्हारे साथ चलने लगेगा।
मेरे दोस्तों,
दुनिया
बहुत बातें करती है—
कभी तुम्हें कम बताती है,
कभी तुम्हें रोकती है।
पर याद रखना—
दुनिया
उसी को सलाम करती है
जो
अपने मन के आगे
किसी और का डर
नहीं रखता।
तो आज
अपने भीतर
ये फैसला लिख लो—
अगर मैं सोचूँगा
कि मैं कर सकता हूँ,
तो मैं कर लूँगा।
और अगर मैं सोचूँगा
कि मैं नहीं कर सकता,
तो मेरे हाथ
मेरे साथ नहीं देंगे।
इसलिए,
सोच को मजबूत बनाओ।
इरादे को तेज़ करो।
और खुद से कहो—
"मैं कर सकता हूँ।"
क्योंकि
जो आदमी
मानता है कि वह कर सकता है—
वही आदमी
वाकई कर दिखाता है।
— पुष्प सिरोही
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