मेरे साथ चलो Poem by Pushp Sirohi

मेरे साथ चलो

मेरे साथ चलो—
मैं कोई अंजान नहीं,
मैं शहर की धड़कनों में
अपना सपना लिए चलता
एक प्रोफेशनल आदमी हूँ।

पर मेरी चाहत
अब भी उतनी ही
सरल और सच्ची है—
जितनी किसी पहाड़ी हवा की
पहली ठंडक।

आओ…
तुम्हें मैं
किसी कॉर्पोरेट मीटिंग की
थकी हुई शाम से निकालकर
ज़िंदगी की असली रौशनी दिखाऊँ।

जहाँ तुम
डेडलाइन्स नहीं गिनोगी,
जहाँ तुम
मेल्स की चिंता नहीं करोगी,
जहाँ तुम्हारी आँखें
सिर्फ सुकून पढ़ेंगी।

हम चलेंगे
खेतों के बीच नहीं—
पर हरियाली के बीच,
जहाँ शहर के शोर के बाहर
एक छोटी-सी दुनिया होगी।

हम बैठेंगे
किसी झील के किनारे,
जहाँ पानी
तुम्हारे चेहरे की मुस्कान
कॉपी करेगा—
और हवा
तुम्हारे बालों से
धीरे-धीरे खेलती रहेगी।

मैं तुम्हें दूँगा
सोने के हार नहीं,
पर ऐसे पल दूँगा
जो सबसे महँगे भी
कम लगें।

मैं तुम्हें दूँगा
सुबह की कॉफी—
जिसमें सिर्फ स्वाद नहीं,
तुम्हारे लिए
मेरी मोहब्बत घुली होगी।

मैं दूँगा
एक शांत-सा घर,
जहाँ तुम्हारे नाम से
दीवारें भी मुस्कुरा उठें।

और हाँ—
अगर तुम चाहो
तो मैं तुम्हें
हर मौसम का गिफ्ट दूँगा।

सर्दियों में
मेरी जैकेट की गर्मी,
बरसात में
मेरी हथेली का सहारा,
गर्मियों में
मेरे शब्दों की छाँव,
और बसंत में
मेरी आँखों की उम्मीद।

तुम्हारे लिए
मैं रात को
"लेट" नहीं होने दूँगा—
मैं तुम्हारे साथ
दिन का सबसे सुंदर हिस्सा
बन जाऊँगा।

तुम्हारे लिए
मैं काम की थकान के बाद
सुकून की तरह लौटूँगा—
और तुम्हारे माथे पर
एक धीमा-सा "सब ठीक है" रख दूँगा।

आओ…
मेरे साथ चलो।

मैं तुम्हें
फूलों का बगीचा नहीं,
पर अपने अंदर का
पूरा वसंत दूँगा।

मैं तुम्हें
तारों की चादर नहीं,
पर अपनी आँखों में
तुम्हारे लिए
एक उजला आसमान दूँगा।

और अगर कोई पूछे
"क्यों? "
तो मेरा जवाब
बहुत साधारण होगा—

क्योंकि तुम
मेरे दिन का उद्देश्य हो,
और मेरा प्रेम
मेरी सबसे साफ़ सच्चाई।

तो आओ…
मेरे साथ चलो।

— पुष्प सिरोही

मेरे साथ चलो
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