जब हम मिलते हैं कहीं Poem by Pushp Sirohi

जब हम मिलते हैं कहीं

जब हम मिलते हैं,
तो दुनिया पीछे नहीं जाती—
वह
अचानक
बेकार हो जाती है।

हमारे बीच
कोई मुस्कान नहीं जन्म लेती,
पहले एक
खामोशी पैदा होती है—
गहरी,
भारी,
सच से भरी हुई।

तेरी मौजूदगी
मुझे सुकून नहीं देती,
वह मुझे
मेरे भीतर
खींच लेती है।

मैं तुझे देखता नहीं,
मैं तुझसे
टकराता हूँ—
और हर टकराव
कुछ पुराना
तोड़ देता है।

हमारे मिलने के लम्हे में
समय
सहमत नहीं होता,
वह बस
हारा हुआ खड़ा रहता है।

तेरे पास होना
मेरे लिए
सहारा नहीं,
एक दबाव है—
कि अब
मैं झूठा नहीं रह सकता।

मेरे शब्द
तेरे सामने
खत्म हो जाते हैं,
और यही
सबसे ईमानदार
बात होती है।

जब हमारी साँसें
एक-दूसरे की
रफ़्तार पहचान लेती हैं,
तो समझ आता है—
कुछ रिश्ते
समझ से नहीं,
टकराव से
जुड़ते हैं।

हम मिलते हैं,
और मोहब्बत
नरम नहीं पड़ती—
वह
और सख़्त,
और सच्ची
हो जाती है।

क्योंकि यह वो मिलन है
जो भरता नहीं,
जगा देता है।

और जो जगा दे—
वही
असली मोहब्बत होती है।

— पुष्प सिरोही

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