तुम्हारे बाद मेरी सुबह Poem by Pushp Sirohi

तुम्हारे बाद मेरी सुबह

प्रिये—
तुमसे मिलने से पहले
मैं जी तो रहा था,
पर जैसे…
किसी नींद में चलता था।

दिन आते थे,
रातें गुजर जाती थीं,
लोग हँसते थे,
मैं भी हँस देता था—
पर मेरी आत्मा
कहीं भीतर अधूरी रहती थी।

तुम आईं—
और जैसे
मेरे भीतर की दुनिया
पहली बार जाग गई।

अब सुबह
सिर्फ सूरज का नाम नहीं,
अब सुबह
तुम्हारे नाम की रोशनी है।
अब 'कल'
बस तारीख़ नहीं,
तुम्हारे साथ
एक नई शुरुआत है।

मैं सोचता हूँ—
तुमसे पहले
हमारी चाहतें क्या थीं?
क्या वो सच थीं,
या बस
मन के बहाने?

हमने जो भी चाहा था
उसमें एक कमी थी—
क्योंकि हमने
एक-दूसरे को नहीं चाहा था।

तुमसे पहले
मेरे सपने छोटे थे,
मेरी हँसी आधी थी,
मेरी खामोशी बहुत भारी थी।

तुम्हारे बाद—
मेरे सपनों को पंख मिल गए,
मेरी हँसी में गहराई आ गई,
और मेरी खामोशी
भी गीत बन गई।

अब मैं कह सकता हूँ—
हमारी दुनिया
दो नहीं… एक है।

तुम मेरी आँखों का विस्तार हो,
मैं तुम्हारे दिल की धड़कन हूँ—
और ये प्रेम
किसी एक पल का नहीं,
ये दो आत्माओं का
स्थायी मिलन है।

प्रिये—
मैं चाहता हूँ
कि हम दोनों
एक ही संसार बन जाएँ,
जहाँ डर
किसी को छू न सके।

जहाँ तुम्हारी आँखों में
मेरा विश्वास रहे,
और मेरी आँखों में
तुम्हारा भविष्य।

जहाँ हमारा प्रेम
किसी सीमारेखा में न बँधे—
बल्कि
समुद्र की तरह फैले,
आकाश की तरह गहरा हो।

और सुनो—
तुम्हारा चेहरा
मेरे लिए
आईना बन गया है,
जिसमें मैं
अपना बेहतर रूप देखता हूँ।

जब तुम मुस्कुराती हो,
तो लगता है
दुनिया ठीक है।
जब तुम दुखी होती हो,
तो लगता है
कुछ भी पूरा नहीं।

अगर हमारी दो सांसें
एक ही लय में चलें,
अगर हमारी दो आँखें
एक-दूसरे में
सच देख सकें—
तो फिर समय भी
हमें अलग नहीं कर सकता।

क्योंकि सच्चा प्रेम
सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं—
सच्चा प्रेम तो
एक-दूसरे की आत्मा में
घर बना लेना है।

तुमसे पहले
मैंने जीवन को देखा था,
अब जीवन
मैं तुम्हारे साथ जीता हूँ।

इसलिए आज—
मैं तुम्हें
अपने दिल की सबसे सच्ची सुबह कहता हूँ…

तुम्हारे बाद
मेरी हर सुबह
पूरी है।

— पुष्प सिरोही

तुम्हारे बाद मेरी सुबह
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