इश्क़ की कला Poem by Pushp Sirohi

इश्क़ की कला

इश्क़ कोई अचानक गिरती हुई बिजली नहीं,
इश्क़ एक कला है—
जिसे सीखना पड़ता है,
जैसे संगीत में सुर,
जैसे तलवार में धार,
जैसे शब्दों में असर।

प्रिये,
अगर तुम प्रेम जीतना चाहते हो
तो पहले
इज़्ज़त कमाना सीखो—
क्योंकि मोहब्बत
ज़ोर से नहीं,
ज़ह्न से जीती जाती है।

1) नज़र का नियम

पहला नियम यह है—
देखो… पर घूरो मत।
क्योंकि घूरना
भूख है,
और देखना
आदर है।

एक नज़र
जिसमें तहज़ीब हो,
हजार शब्दों से
ज़्यादा बोल जाती है।

2) शब्दों की कारीगरी

दूसरा नियम—
मीठा बोलना नहीं,
सच बोलना सीखो।

क्योंकि झूठ का इत्र
थोड़ी देर में उतर जाता है,
पर सच की खुशबू
हड्डियों तक रहती है।

उसे लिखो—
जो दिल में है,
पर ऐसे लिखो
कि सामने वाले का
गर्व भी बचा रहे।

3) समय की समझ

तीसरा नियम—
प्रेम में जल्दी मत करो।
फल कच्चा तोड़ोगे
तो कसैला निकलेगा,
और प्यार कच्चा पकड़ोगे
तो डर बन जाएगा।

रिश्तों को
धूप चाहिए,
पानी चाहिए,
और सबसे ज्यादा
वक्त चाहिए।

4) दूरी का हुनर

चौथा नियम—
हर पल साथ रहना
प्यार नहीं होता।
कभी-कभी
थोड़ा दूर रहकर
और ज़्यादा अपना बनना
इश्क़ की सबसे ऊँची चाल है।

दूरी
अगर वफ़ा से भरी हो,
तो नज़दीकियों से
ज़्यादा प्यारी लगती है।

5) वफ़ा की शर्त

पाँचवाँ नियम—
वफ़ा सिर्फ
एक इंसान से नहीं,
अपने वचन से होती है।

जो प्रेम के नाम पर
किसी दिल को तोड़े,
वो जीतता नहीं,
वो गिर जाता है।

6) ईमान का शृंगार

छठा नियम—
खूबसूरती
चेहरे से नहीं,
चरित्र से बढ़ती है।

बड़े कपड़े मत पहनना,
बड़ा मन पहनना—
क्योंकि इश्क़
राजमहल नहीं,
दिल में घर करता है।

7) प्रेम का आख़िरी पाठ

और आख़िरी नियम, प्रिये—
जिसे पाना हो
उसे कैद मत करना।
फूल से प्यार है
तो उसे तोड़ो मत—
उसकी खुशबू को
साथ चलने दो।

प्रेम
मालिक होना नहीं,
साथ चलना है।

तो अगर तुम पूछो
"इश्क़ कैसे किया जाए? "
तो मैं कहूँ—

इश्क़
तरीका है,
तहज़ीब है,
और दिल की वो पढ़ाई है
जिसमें पास होने के लिए
सबसे पहले
अच्छा इंसान होना पड़ता है।

— पुष्प सिरोही

इश्क़ की कला
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