गंदी साज़िश का शोर Poem by Pushp Sirohi

गंदी साज़िश का शोर

गली में ये शोर महज़ शोर नहीं, एक गहरी साज़िश का हिस्सा है,
तुम्हारी शांति भंग करने का, ये सरहद पार का किस्सा है।
वो फेरी वाले, वो कालू-महबूब, सब एक ही जाल के प्यादे हैं,
जुड़े हैं तार इनके ISI से, और मंशा बड़ी इरादे हैं।

पर्दे के पीछे बैठे आतंकी आका इन्हें नचाते हैं,
तुम्हारे ध्यान को तोड़ने के लिए, ये नए 'स्लीपिंग सेल' जागते हैं।
मगर अफ़सोस! जो पहरेदार थे, वो भी अब तमाशा देखते हैं,
महज़ 'दो पैसे' की खातिर, वो अपनी ईमान की अर्थी फेंकते हैं।

वो भ्रष्ट वर्दी वाला, जिसकी जेब में इन गद्दारों का सिक्का है,
अंधा बनकर बैठा है, क्योंकि उसे बस अपना मुनाफा दिखता है।
उसे नहीं दिखता कि ये दहशतगर्दी अब घरों के भीतर आई है,
उसने अपनी कुर्सी की गरिमा, चंद रुपयों में गवाई है।

अरे! असली किंग तो वो है, जो इस साज़िश को पहचानता है,
कौन सच्चा है, कौन गद्दार, वो सब सच जानता है।
मगर वो 'अंधा' जो दो पैसे लेकर अपनी आँखों पे पट्टी बांधे है,
उसे नहीं पता कि वो भी इसी तबाही के साये में सांसे ले रहा है।

ये बारूद वाली जंग नहीं, ये रूह को कुचलने की तैयारी है,
इन 'हूँ-हूँ' करने वाले गद्दारों की, अब बेनकाब होने की बारी है।

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