अगर कभी प्रेम को
किसी एक वाक्य में लिखना हो—
तो मैं बस
तुम्हारा नाम लिख दूँ।
क्योंकि तुम्हारे बिना
मेरे पास सब कुछ होकर भी
कुछ नहीं लगता,
और तुम्हारे साथ
कम भी बहुत लगता है—
पर दिल…
हमेशा पूरा रहता है।
मैंने बहुत दुनिया देखी,
बहुत रिश्तों की भीड़ देखी,
बहुत वादों की आवाज़ें सुनीं—
पर तुम्हारे जैसा
सच कहीं नहीं मिला।
तुम वो सुकून हो
जो युद्ध के बाद
योद्धा के माथे पर उतरता है,
तुम वो छाँव हो
जो धूप में
थकते कदमों को बचाती है।
अगर दुनिया की दौलत
एक तरफ रख दी जाए,
और तुम्हारी एक मुस्कान
दूसरी तरफ—
तो मैं बिना रुके
तुम्हारी मुस्कान चुन लूँ।
क्योंकि मेरे लिए
सोना-चाँदी नहीं,
तुम्हारा होना
सबसे बड़ा धन है।
तुम मेरे घर की रौशनी हो,
मेरे दिन का सलीका,
मेरी रात का भरोसा,
मेरी सुबह की दुआ।
मैं तुमसे प्रेम
किसी आदत की तरह नहीं करता,
मैं तुमसे प्रेम
एक इबादत की तरह करता हूँ—
रोज़,
और हर रोज़
पहले से ज़्यादा।
और सुनो—
अगर ईश्वर मुझसे पूछे
"तुम क्या चाहते हो? "
तो मैं कहूँ—
"बस यही कि
हर जन्म में
मेरी हथेली में
इसी हाथ की लकीर हो।"
दुनिया कहे
"ये प्रेम ज्यादा है, "
तो भी मुझे फर्क नहीं,
क्योंकि मैं जानता हूँ—
कम प्रेम में
घर नहीं बनते।
मैं तुम्हें
किसी आकाश का तारा नहीं कहूँगा,
मैं तुम्हें
अपनी धरती की रौशनी कहूँगा—
क्योंकि मैं
तुमसे दूर भी रहूँ
तो भी तुम्हारे सहारे
जी लेता हूँ।
और अगर कभी
वक्त हमें थका दे,
चेहरे बदल दे,
बालों में चाँदी घोल दे—
तो भी मेरा प्रेम
उतना ही ताज़ा रहेगा,
क्योंकि मैंने
तुमसे प्रेम
सुंदरता से नहीं—
सच्चाई से किया है।
मैं तुम्हें जितना चाहूँ
उतना कम है,
और जो भी लिखूँ
वो अधूरा है—
क्योंकि मेरे प्रेम की
पूरी कविता
तुम हो।
— पुष्प सिरोही
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem