कहीं Poem by Pushp Sirohi

कहीं

कहीं
हम मिलते हैं,
और कुछ भी ठीक नहीं रहता—
क्योंकि जो सच होता है,
वह हमेशा
आरामदेह नहीं होता।

कहीं
तेरी मौजूदगी
मेरे भीतर
एक दरार खोल देती है,
जहाँ से
मैं खुद को
पहली बार
ईमानदारी से देख पाता हूँ।

कहीं
हमारी खामोशी
बातों से ज़्यादा
भारी हो जाती है,
और शब्द
अपनी हैसियत
खो बैठते हैं।

कहीं
तेरी नज़र
मुझ पर नहीं,
मेरे अंदर पड़ती है—
और मैं
अपने सारे बहाने
वहीं छोड़ देता हूँ।

कहीं
हम पास नहीं आते,
फिर भी
दूरी
टूट जाती है।

कहीं
तेरा साथ
सहारा नहीं बनता,
एक दबाव बनता है—
कि अब
मैं झूठा नहीं रह सकता।

कहीं
हम मिलते हैं,
और मोहब्बत
नरम नहीं होती—
वह
और गहरी,
और सच्ची
हो जाती है।

कहीं
यह मिलन
भरता नहीं,
जगाता है।

और शायद
यही
सबसे ख़तरनाक,
सबसे ख़ूबसूरत
मोहब्बत होती है।

— पुष्प सिरोही 🖤

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