लब्ज़ आते हैं लबों पे और रुक रुक जाते हैं
अश्क़ आते आँखो में पलक पर ठहर जाते हैं
अरमा दिल के दिल में ही दब जाते हैं
वफ़ादारियाँ निभाते निभाते ख़ुद को फ़ना किए जाते हैं
देखना चाहते अक्स अपना दुरस्ती के आलम में
पर ख़ुद को मजबूर पाते हैं
गुज़ारिश की थी तुझसे ओ आसमा वाले
दामन में मेरी तू थोड़े ही सही ख़ुशी के gul भर देना
तुमनेkhar ke darkht bante hain है
क़ुसूर शायद तेरा भी नहीं
मैंने ही किए होंगे दोज़ख़ पाने के गुनाह
कहाँ से फिर तू खुशियों के gul मेरी झोली में डाले
थक गईं है अब उम्मीदें और सांसें भो थकने सी लगी है
जीवन डगर पे सबको अपना बनाते बनाते ख़ुद से पराए हो गए हम
क्योंकर करें चाहत जीने की क्यों अब रखे कोई गुज़ारिश भी
हर किसी ने दिल तोड़ा ना दिया जीने का मकसद किसी ने
कोशिशें की अनेक पर अब लगता ये नासमझी थी हमारी
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