हमीं तो मुंसिफ़ हैं Poem by ARYAN KUMAR

हमीं तो मुंसिफ़ हैं

ये हमारे घर की औरतें हैं,
इनके पाँवों में बेड़ियाँ ही जँचती हैं,
ये हमारे घर की इज़्ज़त हैं,
इनकी आवाज़ें चारदीवारी में ही दफ़्न रहती हैं।

मगर सुनो—

वो जो गली के नुक्कड़ पे खड़ी है, वो हमारी नहीं,
वो जो दफ़्तर में हँस कर बात करे, वो हमारी नहीं,
वो जो रातों को सड़कों पे चले, वो हमारी नहीं।

उसके जिस्म पे हमारा हक़ है,
उसकी रुसवाई पे हमारा हक़ है,
उसे "बेहया" कहने का हमें पूरा हक़ है।

क्योंकि हम मर्द हैं—

हमारा गुनाह बस एक "ग़लती" है,
मगर उनकी ज़रा-सी लग़्ज़िश भी "बदचलनी" है।

हम जो चाहें करें, हम जो चाहें कहें,
हम पाक हैं, हम साफ़ हैं,
बाक़ी सब हमारी हवस का सामान हैं।

हमारी मर्दानगी का मेयार बस इतना है,
कि इनकी हँसी की गूँज हमारी चौखट पार न करे,
इनके ख़्वाबों का क़द हमारी पगड़ी से ऊँचा न हो,
और इनकी ज़ुबान का सच हमारी गैरत में डूब जाए।

वो जो दीवारों के पीछे है, "इज़्ज़त" है,
वो जो बाज़ार में है, "दौलत" है।

हम अपनी इज़्ज़त को पर्दों में क़ैद रखते हैं,
और दूसरों की इज़्ज़त को अपनी हवस की नुमाइश समझते हैं।

हमीं मुंसिफ़ हैं, हमीं जल्लाद हैं,
हम जो चाहें करें—हम ही इस जहाँ की बुनियाद हैं।

हमारी शराब "शौक़" कहलाती है,
उनकी बेबाक़ी "बेहयाई" बन जाती है।

हम रातों को आवारा फिरें—ये हमारा रुतबा है,
वो अगर साया भी देख लें—तो वो गुनाहगार है।

हमें हक़ है—
कि हम इनके वजूद को अपनी जागीर समझें,
कि हम इनके सब्र को इनकी ज़ंजीर समझें।

मगर याद रखना—

ये जो सिसकियाँ आज दीवारों में दफ़्न हैं,
कल तुम्हारी इस झूठी सल्तनत का कफ़न बनेंगी।

एक दिन ये ख़ामोश लब सैलाब बनकर फूटेंगे,
तुम्हारे बनाए हुए सारे क़ानून रेत की तरह बिखरेंगे।

तब न कोई मुंसिफ़ होगा, न कोई "बेहया",
सिर्फ़ इंसाफ़ होगा—
और तुम्हारा ये गुरूर ख़ाक में मिल जाएगा।

हमीं तो मुंसिफ़ थे—

जो इनके किरदार की चादर पर
अपनी हवस के दाग़ गिनते रहे,
जो इनके जिस्म की परछाइयों से
अपनी इज़्ज़त के ख़्वाब बुनते रहे।

हमारा हर गुनाह "मजबूरी" था,
इनकी हर सिसकी "मक्कारी" थी,
इस खोखले निज़ाम में
बस हमारी ही ज़मींदारी थी।

मगर याद रखना—

ये जो तुमने "हया" का पिंजरा बनाया है,
एक दिन टूट जाएगा।

तुम्हारी मर्दानगी का ये नक़ाब
सरे-बाज़ार उतर जाएगा।

जिस दिन ये "बेहया"
अपने वजूद का हिसाब माँगेगी,
उस दिन तुम्हारी ये "शराफ़त"
मुँह छुपाने को जगह माँगेगी।

हमीं तो मुंसिफ़ थे—
मगर अब वक़्त गवाह है,
और तुम मुजरिम हो।

इनके सब्र की राख से उठकर,
अब तुम एक मुकम्मल शिकस्त हो।

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success